अर्जुन: किसने दिया था आइडिया? कब, कैसे और क्यों बना? भारत के युद्धवीर की गाथा
अर्जुन टैंक में 120 मिमी की मुख्य तोप, एक शक्तिशाली इंजन और उन्नत कवच सुरक्षा

भारत आज रक्षा क्षेत्र में खुद को इतना मजबूत कर चुका है कि दुश्मन भारत की ताकत को देख अपनी आंखें नीची कर लेता है. लेकिन क्या यह इतना आसान था. जी नहीं, भारत ने इसके लिए एक लंबा सफर तय किया है. आज भारत स्वदेशी हथियार बनाकर रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर हो रहा है. क्या आप भारत के पहले स्वदेशी टैंक अर्जुन के बारे में जानते हैं. आइए इस खबर में आपको इस युद्धवीर की पूरी गाथा बताते हैं.
भारत का पहला स्वदेशी लड़ाकू टैंक अर्जुन है. इसे भारतीय सेना के लिए रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) द्वारा विकसित किया गया है. 1970 के दशक में, भारतीय सेना ने महसूस किया कि उसे एक आधुनिक मुख्य युद्धक टैंक (MBT) की आवश्यकता है जो पाकिस्तानी और चीनी टैंकों का मुकाबला कर सके. उस समय, भारत मुख्य रूप से सोवियत संघ से टी-72 टैंकों पर निर्भर था. आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने और अपनी विशिष्ट आवश्यकताओं के अनुरूप टैंक विकसित करने के लिए, भारत सरकार ने DRDO को एक स्वदेशी टैंक डिजाइन और विकसित करने का कार्य सौंपा.
प्रोजेक्ट की कैसे हुई शुरूआत?
साल 1974 में, DRDO के लड़ाकू वाहन अनुसंधान और विकास प्रतिष्ठान (CVRDI) ने “अर्जुन” नामक एक नई टैंक परियोजना शुरू की. परियोजना का उद्देश्य एक अत्याधुनिक MBT विकसित करना था जिसमें बेहतर मारक क्षमता, गतिशीलता और सुरक्षा हो. अर्जुन टैंक का विकास एक लंबी और जटिल प्रक्रिया थी, जिसमें कई तकनीकी चुनौतियां शामिल थीं. DRDO ने विभिन्न विदेशी टैंकों और टेक्नोलॉजी का अध्ययन किया और भारतीय परिस्थितियों के लिए उपयुक्त एक अनूठा डिजाइन तैयार किया. टैंक के विकास में स्वदेशी घटकों के उपयोग पर जोर दिया गया, लेकिन कुछ महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों के लिए विदेशी आपूर्तिकर्ताओं के साथ सहयोग भी किया गया.