Supreme Court: नाड़ा खींचना, ब्रेस्ट पकड़ना रेप का प्रयास: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने पलटा इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने पलटा इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला
Supreme Court, (आज समाज), नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें नाड़ा खींचना और ब्रेस्ट पकड़ने को रेप के प्रयास की जगह रेप की तैयारी बताया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी लड़की के पायजामे का नाड़ा खींचना और ब्रेस्ट पकड़ना रेप का प्रयास माना जाएगा। मामले की सुनवाई करते हुए सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि हाईकोर्ट ने आपराधिक कानून के स्थापित सिद्धांतों का गलत इस्तेमाल किया है। कोर्ट ने कहा, हम हाईकोर्ट की इस बात से सहमत नहीं हैं कि आरोप केवल तैयारी तक सीमित हैं।
आरोपियों की हरकत साफ तौर पर रेप की कोशिश की ओर इशारा करती है। पहली नजर में शिकायतकर्ता और अभियोजन ने रेप की कोशिश का मामला बना दिया है। दरअसल इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 17 मार्च, 2025 को दिए आदेश में कहा था कि ये कृत्य रेप या रेप के प्रयास की श्रेणी में नहीं आते, इसके बाद अटेम्प्ट टु रेप का आरोप हटाने का निर्देश दिया था। हाईकोर्ट का फैसला सामने आते ही विवाद बढ़ गया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट के आदेश पर 25 मार्च, 2025 को रोक लगा दी थी।
यह है पूरा मामला
कासगंज की एक महिला ने 12 जनवरी, 2022 को कोर्ट में एक शिकायत दर्ज कराई थी। आरोप लगाया कि 10 नवंबर, 2021 को वह अपनी 14 साल की बेटी के साथ कासगंज के पटियाली में देवरानी के घर गई थी। उसी दिन शाम को अपने घर लौट रही थी। रास्ते में गांव के रहने वाले पवन, आकाश और अशोक मिल गए।
पवन ने बेटी को अपनी बाइक पर बैठाकर घर छोड़ने की बात कही। मां ने उस पर भरोसा करते हुए बाइक पर बैठा दिया, लेकिन रास्ते में पवन और आकाश ने लड़की के प्राइवेट पार्ट को पकड़ लिया। आकाश ने उसे पुलिया के नीचे खींचने का प्रयास करते हुए उसके पायजामे की डोरी तोड़ दी।
लड़की की चीख-पुकार सुनकर ट्रैक्टर से गुजर रहे सतीश और भूरे मौके पर पहुंचे। इस पर आरोपियों ने देसी तमंचा दिखाकर दोनों को धमकाया और फरार हो गए। पीड़ित की मां की शिकायत पर आरोपी पवन और आकाश के खिलाफ आईपीसी की धारा 376, 354, 354बी और पॉस्को एक्ट की धारा 18 के तहत केस दर्ज किया गया।
वहीं आरोपी अशोक पर आईपीसी की धारा 504 और 506 के तहत केस दर्ज किया। आरोपियों ने समन आदेश से इनकार करते हुए हाईकोर्ट के सामने रिव्यू पिटीशन दायर की। जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा की सिंगल बेंच ने क्रिमिनल रिवीजन पिटीशन स्वीकार कर ली थी।
हाईकोर्ट ने कहा था आरोपियों पर से अटेम्प्ट टु रेप का चार्ज हटाया जाए
17 मार्च, 2025 को इलाहाबाद हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा ने कहा- किसी लड़की के निजी अंग पकड़ लेना, उसके पायजामे का नाड़ा तोड़ देना और जबरन उसे पुलिया के नीचे खींचने की कोशिश से रेप या अटेम्प्ट टु रेप का मामला नहीं बनता। यह रेप की तैयारी है। उन्होंने फैसला सुनाते हुए 2 आरोपियों पर लगी धाराएं बदल दीं। वहीं 3 आरोपियों के खिलाफ दायर क्रिमिनल रिवीजन पिटीशन स्वीकार कर ली।
हाईकोर्ट ने आरोपी आकाश और पवन पर आईपीसी की धारा 376 (बलात्कार) और पॉस्को अधिनियम की धारा 18 के तहत लगे आरोपों को घटा दिया। उन पर धारा 354(बी) (कपड़े उतारने के इरादे से हमला या आपराधिक बल का प्रयोग) और पॉस्को अधिनियम की धारा 9/10 (गंभीर यौन हमला) के तहत मुकदमा चलाने का आदेश दिया। साथ ही निचली अदालत को नए सिरे से समन जारी करने का निर्देश दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने लगाई थी फैसले पर रोक
हाईकोर्ट के फैसले पर कानूनी विशेषज्ञों, राजनेताओं और अलग-अलग क्षेत्रों के विशेषज्ञों ने विरोध जताया था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले का स्वत: संज्ञान लिया। 25 मार्च, 2025 को हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी गई।
तत्कालीन सीजेआई बीआर गवई और जस्टिस एजी मसीह की बेंच ने इस केस पर सुनवाई की थी। बेंच ने कहा, हाईकोर्ट के आदेश में की गई कुछ टिप्पणियां पूरी तरह असंवेदनशील और अमानवीय नजरिया दिखाती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, उत्तर प्रदेश सरकार और अन्य पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था।
ऐसी भाषा न बोलें, जो पीड़ित को डरा दे
मामले पर 8 दिसंबर, 2025 को सुनवाई करते हुए कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की थी। कोर्ट ने कहा था, हम सभी हाईकोर्ट के लिए विस्तृत गाइडलाइंस जारी कर सकते हैं। ऐसी टिप्पणियां पीड़ित पर चिलिंग इफेक्ट यानी भयावह प्रभाव डालती हैं और कई बार शिकायत वापस लेने जैसा दबाव भी पैदा करती हैं। अदालतों को, विशेषकर हाईकोर्ट को, फैसले लिखते समय और सुनवाई के दौरान ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण टिप्पणियों से हर हाल में बचना चाहिए।



