मेघालय में मातृवंश परंपरा कायम, लेकिन पकड़ पहले जैसी मजबूत नहीं

मेघालय में मातृवंश परंपरा कायम, लेकिन पकड़ पहले जैसी मजबूत नहीं
मेघालय में मातृवंश (मातृसत्तात्मक वंश परंपरा) के आज भी जीवित रहने का एक बड़ा कारण यह है कि यह परंपरा राज्य की तीनों प्रमुख जनजातियों—खासी, गारो और जयंतिया—में समान रूप से प्रचलित है। इन समुदायों में वंश और संपत्ति का उत्तराधिकार मां की ओर से चलता है, और परिवार की पहचान भी मातृपक्ष से जुड़ी होती है।
विशेष रूप से खासी और जयंतिया समाज में सबसे छोटी बेटी को पारिवारिक संपत्ति की उत्तराधिकारी माना जाता है, जबकि गारो समाज में भी मातृवंशीय परंपरा सामाजिक संरचना का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह है कि भारतीय संविधान की छठी अनुसूची पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों के आदिवासी क्षेत्रों को विशेष प्रशासनिक और सांस्कृतिक संरक्षण प्रदान करती है। मेघालय भी इसी प्रावधान के तहत आता है, जिससे यहां की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था और रीति-रिवाजों को कानूनी मान्यता और सुरक्षा मिलती है।
हालांकि, आधुनिक शिक्षा, शहरीकरण और बदलती आर्थिक परिस्थितियों के कारण मातृवंशीय व्यवस्था की पकड़ पहले जैसी मजबूत नहीं रही है। समाज के भीतर इस पर चर्चा भी बढ़ रही है कि बदलते समय के साथ परंपराओं में किस हद तक बदलाव आवश्यक है।
इसके बावजूद, मेघालय आज भी भारत का एक अनोखा राज्य है जहां “मां की वंश रेखा” सामाजिक संरचना की आधारशिला बनी हुई है।


